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जल कुदरत की अमूल्य देन!

Posted On: 9 Apr, 2015 Others,social issues,कविता में

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रेगिस्तान की मरुभूमि में …

जल के अभाव में जीवन की संभावना 1% भी नहीं है!..अंतरिक्ष में जब भी अन्य ग्रहों के बारे में जानकारी प्राप्त करने का प्रयास होता है, तब उस ग्रह पर पानी है या नहीं…इस दिशामें प्रमुखता से खोजबीन होती है!..इसीसे अनुमान लगाया जाता है उस ग्रह पर जीवन है या नहीं…या पहले कभी रहा होगा!..हवामें ऑक्सीजन,कार्बनडायोक्साइड और अन्य घटकों का पता लगाना इसी श्रेणी में आता है!.हमारी धरती इन सभी घटकों से परिपूर्ण है!..पानी के स्रोत यहाँ प्रचुर मात्रा में है!…नदियाँ, तालाब, झरने और समुद्र …पानी के बहुत बड़े स्रोत यहाँ मौजूद है!…और इसी वजह से मनुष्य और अन्य प्राणी यहाँ सुखसे जीवन व्यतीत कर रहे है!..वनस्पति जगत भी …जैसे कि पेड़ पौधों की सौगात भी पानी ही की वजह से अस्तित्व में है!..इसीसे पता चलता है इस धरती पर जीवन पनपने के लिए पानी का होना कितना महत्व पूर्ण है!

…लेकिन यही पानी धरती के अलग अलग हिस्सों में अलग अलग मात्रा में पाया जाता है!..कहीं प्रचुर मात्रा में है, तो कहीं बहुत कम मात्रा में पाया जाता है!..जहाँ बहुत कम मात्रा में पाया जाता है, वहाँ के लोगों के लिए जीवन गुजारना कितना कठिनतम रहता होगा..इसका अनुभव शब्दों में वर्णित करना उतना ही कठिन है!..अत: पानी को कुदरत की एक बहुमूल्य देन समझकर उसका सही इस्तेमाल किया जाए यही वांछनीय है!

भारत में रेगिस्तान एक ऐसा प्रदेश है, जहाँ पानी के स्रोत बहुत कम मात्रा में उपलब्ध है!..बारिश की कमी भी एक प्रमुख कारण है!..वहाँ की स्त्रियों को जल की प्राप्ति के लिए कितना कठिन संघर्ष करना पड़ता है..यह इस कवितामें दर्शाने की चेष्टा मैंने की है!..प्रस्तुत है!
रेगिस्तान की मरुभूमि में..(कविता)

अंगारों सी तपती रेत…
सूर्य देवता का प्रचंड प्रकोप…
बदन से लिपटी लाल ओढनी…..
मुंह ढका…बस!..आंखें खुली…
गर्म हवाके झोंकों से…
बचती-बचाती नाजुक तन को…
एक कतार में चल पडी…
एक जैसी…दस-बारह पनिहारियां…
नंगे पांवों को आगे बढाती…रेगिस्तान की मरुभूमि में….

गर्म रेत पर चली जा रही…..
तेज धूप की चिंता न जिन्हें,..
मधुर गीतों को गाती-गुनगुनाती…
चली जा रही…चली जा रही!
सिर पर ‘मोढ’मोतियों वाले…
उस पर पितल की चमकती गगरिया…
जाना है अब भी बहुत दूर्…रेगिस्तान की मरुभूमि में…

जल से ही तो जीवन है…
जीवन को बचाना,कर्तव्य ही तो है..
गंगा,जमना हो…या हो सरस्वती…
जल मिलता हो जहांसे…
जगह वही है,स्वर्ग समान….
आखिर पनिहारियों को मिला…
जलसे भरा भंडार…एक ताल..
सुस्ताई बेचारी कुछ देर वहां..
..जी भर कर जल्-पान किया…
गीला आंचल..मुख पर डाला!…
गगरियां भर ली..अपनी अपनी…रेगिस्तान की मरुभूमि में…

शहरवासी नहीं समझतें…
जल की बूंदों की कींमत्…
बहा देते मस्तीमें…बेतहाशा,..
नल खुल्ले देते है छोड!
नालियों में बहाकर..या कारों को नहला कर्…
अपव्यय करते पावन जल का……
यही जल कितना है अनमोल..रेगिस्तान की मरुभूमि में…

बेचारी अबलाएं आज भी…
जल भरने जाती हर रोज्…
दूर..बहुत दूर्… तपती धूप हो या चलें सर्द हवाएं…
तेज आंधी या तूफान् भी हो राह में…
जल ले कर ही लौट आती.
ममतामयी नारियां…रेगिस्तान की मरुभूमि में…

चांद पर पहुंचे है हम..
शनि-मंगल भी है करीब…
विञान ने भी..की बहुतेरी तरक्की..
पर ..समस्या जल की ,
अब तक हुई न दूर…
कब तक दूर से जल…ला,ला कर..
प्यास बुझाती रहेगी पनिहारियां?….रेगिस्तान की मरुभूमि में…

डॉ.अरुणा कपूर.



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Madan Mohan saxena के द्वारा
April 10, 2015

सुन्दर कबिता बहुत बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी …बेह्तरीन अभिव्यक्ति …!!शुभकामनायें.

arunakapoor के द्वारा
April 21, 2015

्धन्यवाद, मदन मोहन सक्सेना जी!


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