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..फंस गए रे..पुस्तक मेले में! (हास्यव्यंग्य)

Posted On: 17 Feb, 2015 Others,हास्य व्यंग में

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…फंस गए रे…पुस्तक मेले में!

…हमारे मोबाइल पर ट्यून बजी…’रघुपति राघव राजा राम…पतित पावन सीता राम…ईश्वर, अल्लाह…’ और हम मोबाइल ढूँढने लगे कि कहाँ है आखिर वो!..दो बार रघुपति राघव बजा और मोबाइल हमें बर्तनों के स्टैंड पर एक पतीले में अटका हुआ मिल ही गया! ..आज महरी छुट्टी पर थी..हम रसोई में बर्तन मांज रहे थे!…सुबह की बेला थी!..मोबाइल हमने कब कौनसे पतीली में सरका दिया था, ये ध्यान से निकल ही गया था!..अच्छा हुआ जो बज गया!…

” हैलो!…शोभा!..कैसी हो?” हमारी सहेली शोभा का फोन था!

” हाँ!..अरुणा!…मैं ठीक हूँ..तुम कैसी हो?” शोभा ने उलटकर हमसे पूछा.!

” मैं भी ठीक ही हूँ..आज क्या बात है?…सुबह सुबह याद किया!” हमने घड़ी की तरफ देखा…सुबह के बारा में आधा घंटा बाकी था!

” अरुणा!..बिलकुल तेरे पड़ोस में आई हूँ!…मेरी देवरानी की बहन की ननद के ससुरजी अस्पताल में एडमिट है!…उनसे मिलने आई थी!…अब रिश्तेदारी का मामला है!…जाना आना तो पड़ता ही है!…ये तुम्हारे पड़ोस का ‘जीवन मृत्यु ‘ अस्पताल जो है…मै यही पर हूँ!…साथ में मेरी पड़ोसन मिसेस कालिया भी है!…हम दोनों तुम्हारे घर ही आ रहे है!..दस मिनट में पहुँच जाएंगे..”

“…शोभा!…बहुत अच्छा लगा कि तुम तशरीफ़ ला रही हो…लेकिन क्या करूँ?..मैं घर पर नहीं हूँ!..”

” …तो कहाँ हो?” शोभा ने छोटासा सवाल दागा!

” मैं अपनी ननद की बेटी की मंगनी पर आई हूँ…’वर राजा ‘ बैंकट हॉल में हूँ!”

“ओह!..चलो!..खूब एन्जॉय करो..तो फिर मैं..” हमने फोन काट दिया!..हम जानते थे कि शोभा हमारे घर जरुर आएगी!…फिर उसकी खातिरदारी करो!..खाना बनाओ!..हे भगवान!..आज तो हमारा बिलकुल मूड नहीं है! …शोभा ये देखने आएगी कि हम सचमुच घर पर है या नहीं!..हमने पति और बच्चों को अच्छी तरह से समझाया कि शोभा के आने पर क्या कहना है!…हमें याद हो आया कि पुस्तक मेला ‘चालू आहे’!…चलो आज पुस्तक मेले की सैर की जाए ..कुछ लिखने पढ़ने वाले पुराने मित्रों से भी वहीं मुलाक़ात हो ही जाएगी!

…हम पुस्तक मेले में पहुँच गए!…क्या मेला था!..ये तो विश्व पुस्तक मेला था!..यहाँ पुस्तकों के अलावा और भी स्टॉल थे!…हम एक जगह रुक कर गोलगप्पे खाने लगे औए पीछे से ‘ हाय अरुणा!..अकेले अकेले..”सुनाई दिया.मुड कर देखा तो ये नंदिनी थी!

” अरे नंदिनी!..यहाँ कैसे?”

” अरे! पुस्तक मेले में तेरी तरह मैं भी तशरीफ़ ले आई…लो कर लो बात!” कहते हुए नंदिनी साथ खड़ी हो गई!…नंदिनी को भी हमने गोलगप्पे, आलू टिक्की और भल्ले-पापडी खिलाई!..बिल भी उदार मन से हमने ही पे किया!

…नंदिनी अब दूसरी और चली गई और हम पुस्तकों की स्टॉल्स की तरफ चल पड़े!..अरे वाह! ये बुक स्टॉल तो हमारे एक पुराने संपादक मित्र का ही निकला!…उन्होंने हमारा जोरदार स्वागत किया और हमारे साथ फोटो भी खिंचवाई!…हमें चार पुस्तकें जब चेप दी तब हमें पता चला कि हमारा स्वागत इतनी गर्मजोशी से उन्होंने क्यों किया!..800 रुपयों का बिल अब हम चुका रहे थे!

…आगे गए…सोचा कोई बात नहीं!पुस्तक मेले में पुस्तकें खरीदना तो शान होती है!..हम ये पुस्तकें जरुर पढेंगे!…

“..अरुणा जी!” ..थोड़ी दूर से आवाज आई!..कोई हमें बुला रहा था!

..हमने देखा एक नव युवती हमें बुला रही थी!हमने उसे पहचाना नहीं!

” अरुणा जी!..मैंने आपको पहचान लिया!..आपकी नॉवल’ उनकी नजर है हम पर..’ मैंने चार बार पढ़ी है!..बहुत पसंद आई!…ये देखिए मेरा नया कविता संग्रह ‘ कौवे का रंग काला ‘!….सौरी अरुणा जी!..मुझे पहले बताना चाहिए था!..मेरा नाम निक्की नचवानी!..मैं बी.ए. पास हूँ!..मेरे लेखन के अलावा भी बहुत से शौक है…

…और निक्की नचवानी ने हमें तीन कविता संग्रह चेप दिए…जिसका बिल हमें 500 रुपये चुकता करना पड़ा!

..सोचा अब ऐसा ही होता रहा तो हाय रे ये पुस्तक मेला!..शोभा से बचने के लिए हम यहाँ आए और ..क्या से क्या हो गया!

अभी क्या से क्या होना बाकी ही था!…दो और पुराने , कभी घनिष्ठ रह चुके सम्पादक मित्रों से सामना हुआ और हम प्रत्येकी एक एक 1000 की पुस्तकों से लाभान्वित हो गए!…अब हम एक जगह रुक कर पर्स खोल कर उसमें झाँकने लगे कि कितने नोट बचे हुए है!..कि पीछे से आ कर किसी ने हमारी आखों पर हाथ रख दिया!

” बताओ तो…मैं कौन हूँ?”

” निक्की नचवानी?” हमें जो नाम याद आया, हम ने बरगला दिया!

” कौन नचवानी” ये तो मैं हूँ …शोभा!” शोभा ने हमारी आखों पर से अपने पंजे हटाए!..शोभा थी…साथ में यकीनन उसकी पड़ोसन मिसेस कालिया थी…जो अपने काले रंग की परवा किए बगैर काले चमकीले सूट में सुसज्जित थी!

..शोभा को समझाने में हमें थोडीसी मशक्कत करनी पडी कि हम यहाँ कैसे पहुँच गए!..जितना झूठ बोल सकते थे: हमने बोल दिया!…शोभा ने बताया की फोन जब कट गया,तब वह बताने जा रही थी कि वो मिसेस कलियाँ के साथ पुस्तक मेले में जा रही है!…काश कि हमने सुना होता!

..शोभा ने हमें कहाँ छोड़ा…एक अच्छे रेस्तोंरा में बैठ कर हम तीनों ने जोरदार लंच किया.. जाहिर है बिल तो हमें अकेले को ही चुकाना पड़ा!..क्यों कि शोभा ने याद दिलवाया कि पिछली बार के पुस्तक मेले में चाय शोभा ने ही हमें पिलाई थी!



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
February 20, 2015

मजेदार व्यंग्य रचना आदरणीया, समयानुकूल!

arunakapoor के द्वारा
February 20, 2015

धन्यवाद,.Ji singh जी!


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